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Video: विष्णुनगरी गया जहाँ पितरों की याद में लगता है मेला

बिहार के इस शहर को सभी ‘तीर्थों का प्राण’ कहा जाता है

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गया — अंतः सलिला फल्गु नदी के तट पर बसा यह शहर हिंदुयों की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है. यह पितरो का मुक्ति पीठ है. पितरो को संसारिक बंधन से मुक्त करने या तारने के कारण ही गया को तीर्थ की संज्ञा मिली  है.

गयाजी पूर्वजों का उद्धार करने केलिए एक ऐसा सर्वोत्तम स्थान है जहां कोई व्यक्ति यदि पवित्र मन से आकर पिंड दान करते है तो उन्हें अश्वमेघ यज्ञ करने का फल मिलता है.

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पूर्वजो की मुक्ति केलिए उपयुक्त समय पितृ पक्ष को माना गया है .इस वर्ष यह लोक पर्व १४ सितम्बर से शरू हुआ है जो गया के पंच कोशी तीर्थ छेत्र में एक पखवारे तक चलेगा.

गया में पितरो के लिए पिंड दान की महिमा का वर्णन पौराणिक ग्रंथो में मिलता है. वेद में कहा गयाहै ‘प्राणह गया’ अर्थात गया सभी तीर्थों के प्राण हैं. यहाँ के मुख्य तीर्थ विष्णुपद, फल्गु और अक्षयवट है. विष्णुपद का सीधा सम्बन्ध भगवान विष्णु के चरण चिन्ह से है.

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वायु पूराण में इसका विशेष वर्णन आया है. कहते हैं एक बार देवासुर संग्राम में अपने पति की मृत्यु के पश्चात् गयासुर की माँ भागकर गया क्षेत्र में आई. गयासुर का जन्म गया में ही हुआ. गयासुर जब थोडा बड़ा हुआ तो उसे आपनी पिता की मृत्यु का कारन ज्ञात हुआ.

उसने देवतायों से बदला लेने के लिए घोर तपस्या की और ब्रह्महा से यह वरदान प्राप्त कर लिया की वह जिसे स्पर्श कर दे वह सीधा मोक्ष को प्राप्त कर ले. ऐसा ही हुआ. आब गयासुर पृथिवी के सभी लोगों को स्पर्श करने लगा. देवतागण भयभीत हो गये क्योंकि सृष्टी का संतुलन बिगड़ने लगा.

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भगवन के कहने पर सभी देवतायों ने गयासुर का शरीर माँगा और उसके पवित्र शारीर पर यज्ञ आरंभ किया. हवन आदि हुए पर गयासुर नहीं मरा. फिर उसके विशाल शरीर पर धर्मशिला चट्टान रखा गया फिर भी वह जिनदा रहा.

अंतत भगवान विष्णु ने स्वयं आकर उसपर अपना चरण रखकर गयासुर को शांत किया और कहा की तुम्हारे शरीर पर जो अपने पूर्वजों के नाम पर पिंड देगा उसे मोक्ष मिलेगा. उसी समय से पिंडदान की प्रथा गयाजी में चल रहीं है.

आध्यात्म रामायण में वर्णित है की त्रेता युग में श्री राम ने गया आकर पिंडदान किया था. श्रीमद्भाग्वाद के अनुसार बिदुरजी ने भी गया प्रवास किया था. सनातन धर्म के लगभग सभी ग्रंथों में गया का नाम वर्णित है.

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गया के विष्णुपद मंदिर में विष्णु का चरण चिन्ह प्रतिष्ठित है. चिन्ह १३ इंच लम्बा और उँगलियाँ उतराभिमुख हैं. भगवन के चरण चिन्ह का उलेख पद्म पूरान, विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवद में भी आया है. उसके अनुसार चरण में शंख, चक्र, कल्प वृक्ष, कमल, अंकुश, ध्वज, वज्र, तिल-जौ, चन्द्रमा, गदा, धनुष प्रमुख हैं. विश्नुपद को पिंडदान के लिए सबसे प्रमुख वेदी मन जाता है.

प्राचीन काल में गया में 365 वेदियां थीं, जहाँ तीर्थयात्रीगण साल भर रहकर पिंडदान किया करते थे। परन्तु अब अधिकांश वेदियां लुप्त हो गई हैं। और अब लगभग 40-45 वेदियां ही रह गई हैं, जहाँ तीर्थ यात्री पिंडदान करते हैं। इनमे से कुछ प्रमुख हैं- विष्णुपद वेदी, फल्गु नदी,  प्रेतशिला, रामशिला, उत्तर मानस, दक्षिण मानस, ब्रह्मसरोवर, सीताकुंड, गयासिर, गयाकूप, भीमगया, गोप्रचार, गदालोल और अक्षयवट.

पिंडदान हेतु इस वर्ष लगभग दो लाख तीर्थ यात्री गया आचुके है और अभी भी तीर्थ यात्रियों के आने जाने का सिलसिला जारी है .इस वर्ष कई राज्यों में आये बाढ़ और आर्थिक मंदी का प्रभाव का प्रभाव भी गया के पितृपक्ष मेला पर पड़ा है, ऐसा पुरोहितों का कहना है. फिर भी तीर्थ यात्रियों से गुलजार है विष्णु नगरी.

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